साहित्य और समाज विज्ञान की पत्रिका "चेतना" के आगामी अंक हेतु रचनाएँ आमंत्रित हैं।

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बीते तीन दशकों में सामजिकताओं के अनेक, कुछ प्रत्याशित और कुछ सर्वथा अप्रत्याशित, संस्करणों का जन्म और विकास भारत में हुआ है। इस दौर ने आदिवासी और दलित चेतना का उद्भव देखा है तो मध्य वर्ग का अपूर्व विस्तार और विराट स्वप्न भी।  हिन्दू सांस्कृतिक राष्ट्र का पुनर्विन्यास नेहरू युग के अवसान की घोषणा के साथ घटित होता है।  

इन सामाजिकताओं के तनाव और उत्सवविफलताओं और कुंठाओं, उल्लास और ऊर्जा से निर्मित होता यह भारत अपनी नियति से एक नवीन साक्षात्कार की दहलीज़ पर है। 

भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमलाकी पत्रिका 'चेतना' का आगामी अंक आकांक्षाओं और अंतर्विरोधों में रंगी इन सामाजिकताओं और इनके हाशियों पर केंद्रित है।  इस विषय पर निबंधों का स्वागत है:  

आशुतोष भारद्वाज (abharwdaj@gmail.com), 

राजेश कुमार (rajbhasha@iias.ac.in)