समाज, संस्कृति एवं जीविका की निर्मिति : उत्तर भारत में नदियों और निषादों का सहजीवन प्रस्तावित तिथि

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Date/Time
Date(s) - 22/07/2019 - 24/07/2019
10:00 am - 5:30 pm

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Seminar Hall

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राष्ट्रीय संगोष्ठी

समाज, संस्कृति एवं जीविका की निर्मिति : उत्तर भारत में नदियों और निषादों का सहजीवन प्रस्तावित तिथि 22 जुलाई से 24 जुलाई 2019

संगोष्ठी का संदर्भ

इधर हाल के समय में वैश्विक स्तर पर जल स्रोतों के क्षरण एवं इसके सामाजिक-सांस्कृतिक निहितार्थों पर एक गहन विमर्श सामने आया है। जल स्रोतों एवं तालाबों, नदियों, सागरों और बर्फ के भंडारों पर अकादमिक और लोकप्रिय दायरों में चर्चा की जा रही है। नदियों के सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास, उनके बहाव और स्वास्थ्य एवं पारिस्थितिकीय तंत्र पर ध्यान देर से गया है। फिर भी जल को केंद्र में रखकर कई महत्वपूर्ण शोध सामने आए हैं। अथर्ववेद में जल को पवित्र एवं स्वच्छ करने वाला कहा गया है और इससे समृद्धि आती है।1 यहाँ आकर जल एक ऐसा ‘स्पेस’ बन जाता है जहाँ ‘सांस्कृतिक’ विचार जन्मते हैं और उस इतिहास का निर्माण करते हैं जहाँ किसी ‘समुदाय का जीवन’ विकसित होता है।

भारत में ऐसे ही एक नदीय समुदाय, निषाद, का जीवन नदियों से घनिष्ठ रूप से जुड़ा है। इनके जीवन पर एक पैनी नजर से जल पर मनुष्यों की निर्भरता और उसके फलस्वरूप उपजे एक भिन्न जीवन-संसार के व्यापक प्रश्नों की पड़ताल संभव हो सकेगी। प्रस्तावित संगोष्ठी इस दिशा में एक प्रयास है। इतिहास का एक गहन पाठ इस बात का प्रमाण देता है कि देश की संस्कृतियों, समाजों एवं धर्मों की निर्मति में हाशियाकृत समुदायों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। दुर्भाग्यवश, भारत में सामाजिक इतिहास लेखन इसे उचित तरीके से सामने रखने में अब तक असफल साबित हुआ है। विभिन्न जातियों और समुदायों के सामाजिक और सांस्कृतिक अधिवासों की भूमिका को भी समाज वैज्ञानिक विमर्शों में उपेक्षित किया गया है। यह समुदाय का उद्देश्य नदियों और उससे जुड़े समुदायों का राज्य से बहु-स्तरीय संबंधों की समझ और पड़ताल विकसित करना चाहता है जिससे एक सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण और राजनीतिक आर्थिकी उपजी है।

1990 के दशक से ही गरीबी को मापने और निर्धारण करने के लिए चर्चा भौतिक परिसंपत्तियों, शिक्षा और सार्वजनिक सुविधाओं तक पहुँच के संदर्भ में होती रही है। समुदायों के जीवन में प्राकृतिक और सांस्कृृतिक स्रोतों की भूमिका को उपेक्षित करने की प्रवृत्ति भी रही है। पर्वतों, वनों और नदियों पर आश्रित विभिन्न समुदायों के लिए वंचना के स्वरुप और गरीबी के मामले एक अधिवास से दूसरे अधिवास में भिन्न होते हैं। यदि किसी निषाद की नदी तक पहुँच बाधित की जाती है, इससे पूरे समुदाय का जीवन बुरी तरह प्रभावित होता है। बिलकुल इसी बिंदु पर, भारत में हमारा हाल का अनुभव बताता है कि आधुनिक तकनीक और राज्य द्वारा बनाए गए विनियमों ने निषाद और अन्य हाशियाकृत समुदायों की जीविका के अवसरों को प्रतिकूल तरीके से प्रभावित किया है। ऐसा देखा गया है कि कारीगर जातियों एवं समुदायों पर प्रौद्योगिकी के प्रतिकूल प्रभाव को समझे बिना हम भारत के लोगों के जीवन की वास्तविक पड़ताल नहीं कर सकते हैं। शताब्दियों से मल्लाह, केवट, मांझी जैसी दर्ज़नों जातियाँ नदियों से अपनी जीविका अर्जित करती रही हैं। यह संगोष्ठी इस पर ध्यान केंद्रित करना चाहती है कि किस प्रकार विकास गतिविधियों ने इस सांस्कृतिक और आर्थिक जुड़ाव को प्रभावित किया है; किस प्रकार औपनिवेशिक राज्य ने नदियों पर अपना नियन्त्रण बढ़ाया और समुदायों के जीवन पर कब्ज़ा।

दक्षिण एशिया के इतिहास पर लिखते हुए सुनील अमृत नदियों और जलवायु के महत्त्व को रेखांकित करते हैं। वे भारतीय समाज की बनावट, आर्थिक और राजनीतिक विचारों को नदियों के संबंध में समझने का प्रयास करते हैं और इसके साथ ही साथ औपनिवेशिक एवं उत्तर-औपनिवेशिक राज्य ने नदियों को नियंत्रित और अपनी इच्छाओं का अनुगामी बनाने की कोशिश की है, इस तथ्य को भी वे रेखांकित करते हैं।2 वास्तव में किसी भी देश-काल में नदी-स्थल एक सार्वजनिक स्थल बन जाता है3 जहाँ इतिहास, संस्कृति, धार्मिक विश्वास और राजनीति कई-कई बिन्दुओं पर मिलते हैं।4 चूँकि नदी समाज का निर्माण करती है इसलिए इतिहासकार नदी को ही एक पाठ के रूप में देखते हैं। फर्नांड ब्रोदेल जैसे सुप्रसिद्ध इतिहसकारों ने भौगोलिक और प्राकृतिक कारकों जैसे नदी, पर्वत, पत्थर और समुद्रों के ऐतिहासिक महत्त्व पर जोर दिया हैं। इसके साथ ही ब्रोदेल ने नदियों के इतिहास को एक ‘दीर्घ अवधि’ के रूप में देखा है। मानवीय समाजों एवं नदियों के ऐतिहासिक संबंध पर

पुनर्चिंतन करना इसलिए महत्त्वपूर्ण है। इस दिशा में किए गए शोधकार्य भी इस संगोष्ठी की चिंता में शामिल हैं। इस संगोष्ठी का एक मुख्य केंद्र इतिहास में नदी और मनुष्य के संबंध में राज्य की भूमिका की चर्चा है।

उपर्युक्त कारणों से ही अनुपम मिश्र ने एक बार नदियों को ‘समाज का तरल दर्पण’ कहा था।5 यहाँ उनका आशय नदियों के आर्थिक महत्त्व के साथ उनके सांस्कृतिक महत्त्व को रेखंकित करना था। यह संगोष्ठी नदी और समाज के विभिन्न पक्षों को आपस में जोड़ते हुए उनकी व्याख्या करना चाहती है। यह बात एक उदाहरण (नदियों के किनारे लगने वाले मेलों, त्योहारों और जनसंकुलों) से स्पष्ट हो जाएगी।

विद्वत्जगत इस बात को कहता रहा है कि गंगा और अन्य नदियों के किनारे स्थित तीर्थ स्थल एक जन-अवधारणा के रूप में प्रतिष्ठित रहे हैं। प्रयाग(उत्तर प्रदेश) में गंगा और यमुना के संगम पर आयोजित होने वाला कुम्भ मेला भारतीय उपमहाद्वीप को एक खुले समाज के रूप में प्रस्तुत करता है जिसमें बच्चे, विधवाएँ, घुमक्कड़, संन्यासी, पुजारी, किसान, व्यापारी, सैनिक, शासक और जमींदार आपस के बंधन तोड़कर एक समय के लिए आपस में घुलमिल जाते हैं।6 मनुष्यों के मिलने-जुलने के यह स्थान एक अपरिचित, दुर्गम इलाके को एक परिचित धार्मिक स्थान के रूप में परिवर्तित कर देते हैं जहाँ पर विभिन्न क्षेत्र और समुदाय एक दूसरे से मिल सकें।7 भारत की संस्कृतियों की यह बहुवचनीयता भारत की छोटी और बड़ी नदियों के किनारे देखी जा सकती है। यह संगोष्ठी इस परिघटना का भी परीक्षण करना चाहती है।

हमारे जीवन में नदियों की भूमिका होने के बावजूद भी गंगा एवं अन्य प्रमुख नदिया प्रदूषित हो रही हैं जिन्हें निकट भविष्य में मुश्किल से जीवन दिया जा सकेगा। प्रदुषण ने न केवल पशु-पक्षियों और वनस्पतियों का जीवन संकट में डाल दिया है बल्कि नदियों का पारिस्थितिकीय स्वास्थ्य भी बुरी तरह से प्रभावित किया है। नदियों पर आश्रित मनुष्य का जीवन भी संकट में है। यह संगोष्ठी प्रदूषण की समस्या को नदियों के सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य में देखने का प्रयास करेगी।

संगोष्ठी का उद्देश्य

1. प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर रहे परिधीय समुदायों के जीवन इतिहासों को दर्ज़ करना।

2. भारतीय संस्कृति एवं इतिहास के क्षेत्र में नदीय समुदायों द्वारा किए गए योगदान की एक ऐतिहासिक समझ का विकास करना।

3. राज्य के नदीय समुदायों के प्रतिदिन के सामाजिक-आर्थिक टकराओं और उनकी संस्कृति और जीविका के प्रश्नों का सैद्धान्तीकरण करना।

4. उत्तर भारत के लोगों के जीवन में नदियों के सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक पक्षों/प्रभावों का अनुरेखण करना।

5. उत्तर भारत में गंगा और अन्य नदियों के किनारे लगने वाले मेलों के सांस्कृतिक, सामाजिक आर्थिक योगदान /प्रभाव की जाँच-पड़ताल करना।

6. नदियों और उनसे जुड़े समुदायों के आपसी संबंधों में राज्य की भूमिका का परीक्षण करना।

संगोष्ठी में प्रस्तावित उपविषय

1) पूर्व औपनिवेशिक भारत में विभिन्न समुदायों का प्राकृतिक संसाधनों से संबंध।

2) निषादों के जीवन, जीविका एवं संस्कृति की निर्मिति में नदी-पारिस्थितिकी की भूमिका।

3) निषादों के जीवनबोध के निर्माण में नदी की भूमिका।

4) लोकप्रिय संस्कृति में गंगा एवं निषाद।

5) उत्तर भारत के कला-रूपों से नदी का सहजीवन।

6) उत्तर भारतीय समाज में नदियों की सांस्कृतिक और धार्मिक भूमिका।

7) इस संगोष्ठी में उपर्युक्त उपविषयों से जुड़े अन्य महत्त्वपूर्ण विषयों का भी स्वागत है।

संगोष्ठी के प्रस्तावित सत्र

1) नदी एवं मनुष्य : आरंभिक भारत का इतिहास लेखन, प्राकृतिक संसाधन और समुदाय

2) नदी, समाज और प्रस्तुतीकरण : पूर्व औपनिवेशिक उत्तर भारतीय सामाजिक व्यवस्था में निषादों की उपस्थिति

3) पारिस्थितकीय-मानविकी, प्रकृति और समाज

4) निषाद समुदाय के प्रतीक और सामाजिक पारिस्थितकी

5) संस्कृत, पाली, प्राकृत और उत्तर भारतीय साहित्य में निषाद और नदियाँ

6) भारत की वास्तुकला, शिल्प और चित्रकला में नदियाँ

7) लोक एवं मौखिक परंपराओं में नदियाँ और उनका सांस्कृतिक अभिप्राय

8) फिल्मों में नदी और उसका जनसमुदाय

9) तीर्थयात्रियों का संसार : नदी, मेले और त्यौहार

10) समुदाय, राज्य और जीविका ( नदियों में नाव चलाने, मात्स्यिकी और बालू-खनन के विशेष संदर्भ में)

11) नदियों मे प्रदूषण

इस संगोष्ठी में सीमित संख्या में प्रतिभागियों को आमंत्रित किया जाएगा। इच्छुक प्रतिभागी अपने प्रस्तावित शोध पत्र के 500 शब्दों के शोध-सारांश और अपने आत्म-वृत्त को नीचे दिए गए ईमेल पर दिनांक 9 जून 2019 तक भेज दें। चयनित प्रतिभागियों को संस्थान 20 जून तक 2019 तक आमंत्रण पत्र भेजेगा। यह संस्थान की नीति है कि वह सेमिनार की प्रोसीडिंग्स के बजाय शोधपत्र प्रकाशित करता है। इसलिए सभी आमंत्रित प्रतिभागियों से आशा की जाती है कि वे अपने पूर्ण, अप्रकाशित और मौलिक शोधपत्र संदर्भ सहित भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान के अकादमिक संस्रोत अधिकारी को 10 जुलाई 2019 तक भेज देंगे। स्टाइल शीट के लिए संस्थान की बेबसाइट के इस पते पर जाएं : http://www.iias.org/ content/shss

सेमिनार की अवधि में भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान प्रतिभागियों के ठहरने की व्यवस्था करेगा और वह भारत में आगमन के स्थान से लेकर शिमला तक वायुयान या रेल से आने-जाने का यात्रा व्यय भी अदा करेगा।

 

 

National Seminar on Society, Culture and the Making of Livelihood:

The Symbiosis of Rivers and Nishads in Northern India 22-24 July, 2019

 

1. Contexts of the Seminar

In recent times, a compelling discourse has been generated at the global level over the increasing scarcity water and its socio-cultural implications. Water bodies and repositories such as ponds, rivers, seas and icecaps are now frequently and deservedly discussed in academic and popular arenas. The socio-cultural history of rivers, their flow, health and ecosystem, has lately found due attention among researchers resulting in numerous studies with water as their main focus. In the Athrvaveda, water is described as holy and purifying and is invoked to confer happiness. [1] Here, water is a ‘space’ where the ‘cultural’ takes form, and creates history as ‘the life of a community’ develops around it.

The life of one of the riverine communities, i.e. Nishads, is intimately tied to numerous rivers in India. A close look at the life of these communities will allow us to examine the broader question of human dependence on water and the consequent making of different life worlds. The proposed seminar is an effort in this direction. A close reading of history offers proof that the marginalized communities of India have played a vital role in shaping the contours of cultures, societies and religions of the country. Unfortunately, the writing of social history in India has failed to deal with this adequately. The role of social and cultural habitats in forming the cultures of different castes and communities is also often ignored in social science discourses. This seminar aims to examine and understand the socio-cultural environment and political economy resulting from the multi-layered relationship between rivers and their communities.

Discussions around the measurement and assessment of poverty in modern India, particularly since the 1990s, focus on material assets, education and access to public facilities. There has been a tendency to ignore the role of natural and cultural resources in the lives of communities. The nature of deprivation and poverty among different communities dependent on mountains, forests and rivers varies from habitat to habitat. When the Nishad’s access to river is restricted, it adversely affects the entire community. At the same time, our recent experience in India suggests that modern technologies and state regulations have also adversely affected the

livelihood opportunities of the Nishads and other marginalized communities. It has been observed that without understanding the adverse impact of technology on the artisan castes and communities, we will not be able to make a true enquiry into the life of the peoples of India. For centuries, more than a dozen castes such as Mallah, Kewat and Manjhi among others, have been earning their livelihood from rivers. This seminar wishes to focus on how development activities have affected this cultural and economic associations and how the colonial state had tried to increase its hold on rivers and thereby control the communities concerned.

Writing on the waters of South Asia, Sunil Amrith highlights the importance of rivers and climate. He tries to investigate the fabric of Indian social, economic and political thought in relation to rivers, and the taming and controlling of the rivers by the colonial and post-colonial states. [2] Over a given time and space, the riverscapes [3] become public spaces where history, culture, religious belief and politics meet at different levels. Since it shapes society, the historian has started to look at the river as a text. Eminent historians like Fernand Braudel have emphasized the historical importance of geographical and natural factors like rivers, mountains, plateaus and seas. Along with this, Braudel had also considered the history of rivers in the ‘longue duree’. [4] It is important to rethink the historical relations between human societies and rivers. Research along these lines also lies within the purview of the seminar.A major focus of this seminar would be to discuss the role of the state in the river-human relationship in history.

For all the reasons mentioned earlier, Anupam Mishra once called rivers ‘the liquid mirror of society’. By this, Mishra meant to convey the cultural significance of rivers apart from their economic importance. [5] The seminar intends to correlate different aspects of the relationship between rivers and their societies. For example, there is a clear relation between fairs, festivals and gatherings and the rivers whose banks they are held along.

Scholars have been observing that pilgrimage to prescribed sites on the Ganga and other rivers has always been a mass phenomenon. The fair of Kumbha in Prayaga(Uttar Pradesh), at the confluence of the rivers Ganga and Yamuna, gives us a glimpse of the Indian subcontinent as an open society, where children, widows, wanderers, ascetics, priests, peasants, traders, soldiers, kings and landlords break rank for a moment and mingle with each other. [6] These spaces of human confluence transformed an unknown, inaccessible terrain into a familiar religious site where disparate regions and communities could converge.[ 7]This heterogeneous reservoir of

Indian culture(s) can be seen over small and big rivers of the country. The seminar is also interested in investigating such phenomena.

Despite and because of the significance of rivers in our lives, the Ganga and other prominent rivers of India are getting polluted almost beyond repair in recent times. The pollution in rivers has jeopardized not only the life of their flora and fauna but has also severely affected the ecological health of the rivers. The human life dependent on rivers is also at risk. The seminar will try to look into this problem of pollution alongside a focus on socio-cultural perspectives in the study of rivers.

 

2. Objectives of the Seminar

1. Document the life histories of marginalised communities who have been dependent on natural resources.

2. Develop a historical understanding of the contributions of riverine communities to Indian culture and history.

3. Theorise the question of culture and livelihood of riverine communities and the everyday socio-economic contestations they are engaged.

4. Trace the cultural, social and economic aspects of rivers in the lives of the peoples of northern India.

5. Investigate the cultural, social and economic contributions/effects of fairs held along the banks of the Ganga and other rivers of northern India.

6. Examine the role of state in the relationship between rivers and their communities.

 

3. Suggested sub-themes of the seminar

1. The relations of different communities with natural resources in pre-colonial India.

2. The role of river ecology in the making of lives, livelihood and culture of Nishads.

3. The role of rivers in the making of the world-view of the Nishads.

4. The Ganga and Nishads in popular culture.

5. The representations and semiotics of rivers in the art forms of north India.

6. The cultural and religious role of rivers in north Indian society.

7. Any other pertinent questions related to above themes.

 

4. Proposed sessions of the seminar

1. River and Humans: History Writing, Natural Resources and Communities of Early India.

2. River, Society and Representation: Presence of Nishads in pre-colonial north Indian social order.

3. Ecological Humanities, Nature and Society.

4. Symbols and Social Ecology of Nishad Communities.

5. Nishads and Rivers in Sanskrit, Pali, Prakrit and literature of north India

6. Rivers in Architecture, Sculpture and Painting of India.

7. River in the Imagination of Folk and Oral Traditions and its Cultural Meanings

8. River and her peoples in movies

9. The World of Pilgrims: Rivers, Fairs and Festivals.

10. Community, State and Livelihood ( with special reference to boating, fishing and sand mining in rivers)

11. Pollution in Rivers.