इतिहास

सन् 1823 से लगभग छः दशकों तक, गर्वनर जनरल और फिर भारत के वाइसराय शिमला में अपने ग्रीष्मकालीन प्रवास के दौरान एक अनुपयुक्त आवास से दूसरे आवास में बदलते रहे। लार्ड लिटन ने (1876-80) नया आवास बनाने के लिए आब्जरवेटरी हिल को चुना। इस पहाड़ी का नाम आब्ज़रवेटरी हाउस की वजह से पड़ा जिसका निर्माण सन् 1840 में कैप्टन जे.टी. बालू ने कराया था। कालांतर में आब्ज़रवेटरी हाउस वाइसराय के निजी सचिव का आवास बना। आब्ज़रवेटरी हिल ऐसा एक जल-विभाजक स्थल है जहां से जल-प्रवाह भारत के दोनों ओर बहते हैं। इसके ओर का पानी बंगाल की खाड़ी तक जाता है और दूसरी तरफ का पानी अरब सागर में जा मिलता है।
नए वाइसराय निवास के प्रारंभिक नक्शे रायल इंजीनियर्स के कैप्टन एच.एच. कोल ने तैयार किए थे। ये नक्शे काम के सनकी वायइराय लार्ड लिटन को, सन् 1878 में शिमला ललित कला प्रदर्शनी के मौके पर प्रस्तुत किए गये थे। तथापि लार्ड डफरिन (1884-88) ने इस विषय में विशेष रूचि ली। उसने भारत के राज्य सचिव लॉर्ड रैंडाल्फ चर्चिल को अटठतीस लाख रूपए के खर्च की परियोजना अनुमति के लिए रखी। इस संपदा के रखरखाव पर डेढ़ लाख रूपए वार्षिक व्यय का अनुमान था।
वाइसराय का सपना साकार करने के लिए हेनरी इरविन को वास्तुकार और निर्माण कार्य का मुख्य अधीक्षक नियुक्त किया गया था। एफ.बी हैबर्ट और एल.एम. सेंट क्लेयर ने कार्यपालक अभियंता के रूप में सहयोग दिया था। उनके साथ तीन सहायक अभियंता थे- ए.स्काट, टी मैक्पर्सन और टी.एस. इंगलिश। मोटे तौर पर लॉज का खाका लॉर्ड डफरिन ने सुझाया था और वह नक्शे को बार-बार जांचता और संशोधित करता रहता। ब्रिटिश साम्राज्य की सबसे आलीशान इमारत के तौर पर इसका निर्माण होना था, इसलिए लोक निर्माण विभाग का तंत्र पूरी मुस्तैदी से इसमें लगा दिया गया और सन् 1886 में स्थल पर निर्माण कार्य शुरू हो गया था। एक विस्तृत समस्थल बनाने के लिए आब्जरवेटरी हिल के ऊपरी भाग को समतल किया गया था। ऊपरी पतली मिट्टी के नीचे कुचली हुई सलेटी चट्टान थी, जिसमें हर ओर दरारें थीं। इसे सही करने के लिए नींव को मजबूत बनाते हुए, कंक्रीट का भरपूर इस्तेमाल किया गया। आखिर भवन का जो रूप मैदान में बनकर तैयार हुआ, उसका वास्तुशिल्प मोटे तौर पर अंग्रेजी रेनासां शैली का कहा जा सकता था, और यह एलिजा़बेथ कालीन बनावट से प्रेरित था। यद्यपि स्काटिश उच्च भूमि के महलों का निर्माण निश्चय ही अभिभूत करने वाला है। यह भवन हल्के नीले-स्लेटी पत्थर की चिनाई से बना है और इसकी ढलानदार छतों में ‘खपरेल’ लगाई गई है।
लार्ड और लेडी डफरिन ने 23 जुलाई, 1888 को भवन में प्रवेश किया। बिजली के प्रकाश की नई व्यवस्था को देखकर विशेषकर लेडी डफरिन बड़ी खुश थी। एक पखवाड़ा बीत जाने पर, डफरिन परिवार ने पहली दावत दी। इस भवन और इसके अंदर मृदुल प्रकाश को देखकर मेहमान आश्चर्य चकित थे। छियासठ लोग रात्रिभोज में शामिल हुए। यद्यपि बिजली की रोशनी पर्याप्त थी, बावजूद इसके भोजन की मेज पर मोमबत्तियां सजाई गई थीं। मेहमान जब नाचना बंद कर देते, इस बीच वे नए कमरों में चक्कर लगाकर अपना मन बहलाते या पहली मंजिल पर जाकर नीचे चल रही पार्टी का नजारा लेते थे। दरअसल यह भवन इतना विशाल था कि आने वाले सालों में आयोजित नृत्य-पार्टियों के दौरान मेहमानों की संख्या 800 तक हो जाती थी।
वाइसराय भवन का प्रमुख भाग अब तैयार था, जबकि कुछ निर्माण कार्य सितम्बर 1888 तक चलता रहा। वास्तव में लार्ड डफरिन के इस स्काटिश गढ़ में छोटे-मोटे काम तो लम्बे समय तक चलते ही रहने थे, क्योंकि जल्दी में पूरे किए गए काम में कई त्रुटियां रह गई थी। गढ़े गए पत्थरों की सजावट वाला मुख्य ब्लाक तीन मंजिला है जबकि रसोई विंग पांच मंजिला है। भवन पर मीनार ऊँची दिखाई देती है। लार्ड कर्ज़न के कार्यकाल (1899-1905) में इस मीनार की ऊँचाई और बढ़ाई गई। सन् 1927 में लार्ड इर्विन के समय (1926-31) जन-प्रवेश भवन भी जोड़ा गया। उस समय भवन का स्वरूप इसके सभी खण्डों सहित यथा-दृष्टि सुन्दर आकृति में, या विरूपित वास्तुशिल्पीय बनावट में, बन चुका था, जो आज भी मौजूद है।
जहां तक कि भवन के भीतर का संबंध है वह व्यापक काष्ठ-कर्म युक्त है, जोकि समय का सही परीक्षण है। दिल्हाबंदी और भित्तिस्तंभ सहित, भारी मध्यस्तम्भ और हैंड-रेलिंग वाली सीढ़ी अनूठी है। इसके लिए बर्मा से सागवान की भारी लकड़ी जहाज पर लाद कर लाई गई थी। जरूरत पड़ने पर इसके स्थान पर स्थानीय देवदार और काष्ठ-नक्काशी की पंसद के अनुसार अखरोट की लकड़ी का भी प्रयोग किया गया था। मार्की कर्जन के समय भवन के दूसरे हिस्सों में भी काफी हद तक नयी सजावट हुई। भोजन-कक्ष में नक्काशी पूरी की गई, और चीन सम्राट के सिंहासन के पीछे जो यवनिका लगी होती थी, उसकी प्रतिकृति भी इस कक्ष में लगाई गई। पुराना काउंसल चैंबर जो बाद में बिलियर्डस रूम बना, उसमें हरेक गवर्नर-जनरल और वायसराय के चित्र टांगे गये थे। भारतीय हथियारों का एक संग्रह मुख्य गलियारे की दीवारों पर सजाया गया था, जहां उन हथियारों की छाप अभी भी देखी जा सकती है।
331 एकड़ में फैली यह एस्टेट मौज मेलों तथा गार्डन पार्टियों के लिए एक शानदार जगह थी। लॉर्ड लैंडसडाऊन के वाइसराय काल में यहां के मैदानों और शाद्वलों के प्राकृतिक-दृश्य निर्माण का बृहद् किन्तु आनंदप्रद कार्य प्रारंभ किया गया। आज भले ही संपदा पहले से छोटी रह गई है, मगर अब भी 110 राजसी एकड़ का भू-भाग है। संपदा के स्टाफ में काम करने वालों की संख्या पहले के 700 की तुलना में अब बहुत कम है। उद्यान का काम अब मात्र 23 लोगों के जिम्मे है। लेकिन दुर्लभ और विदेशी पौधों व घास की अनेक किस्मों का संग्रह पहले की तरह ही दर्शनीय है। उद्यान की सौंदर्यता को प्रकट करने वाला ग्लास हाऊस एक तरह का छोटा तीर्थ स्थान है।
दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के समय भारत की दशा उस उबलते कड़ाहे की तरह हो गई थी, जिसमें पहले ही एकाध बार उफान आ चुका था। 14 जून 1945 को वाइसराय लार्ड वेवल ने एक रेडियो प्रसारण में शिमला सम्मेलन की घोषणा की, जिसकी रूपरेखा तत्कालीन राजनीतिक स्थिति में सुधार लाने और भारत को पूर्ण-स्वराज के अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर करने के लिए तैयार की गई थी। इस सम्मेलन में वाइसराय की कार्यकारी परिषद के पुनर्गठन का प्रस्ताव था। जिसके अनुसार गवर्नर जनरल और कमाण्डर-इन-चीफ को छोड़कर बाकि सभी सदस्य भारतीय होने थे। इन भारतीय सदस्यों की संख्या देश की कुल आबादी में हिन्दुओं व मुसलमानों के अनुपात के आधार पर रखने का प्रावधान था। 25 जून से 14 जुलाई 1945 तक वाइसरीगल लॉज में यह सम्मेलन हुआ। इस बैठक में भारतीय राजनीतिक नेतृत्व के बहुरंग- महात्मा गाँधी, मौलाना आज़ाद, पण्डित जवाहरलाल नेहरू, सी.राजगोपालाचारी, मास्टर तारा सिंह और मुहम्मद अली जिन्ना जैसे राष्ट्रीय नेता उपस्थित थे। यद्यपि पूरे सम्मेलन के दौरान महात्मा गाँधी शिमला में रहे मगर कान्फ्रेंस के किसी भी सत्र में व्यक्तिग रूप से हाजिर नहीं हुए। यह कान्फ्रेंस तब तक डगमगाती रही, जब तक वाइसराय सहित हर प्रतिभागी ने इसकी असफलता स्वीकार न कर ली। शायद भारत के विभाजन को रोकने का अंतिम अवसर था जो हाथ से निकल गया था।
युद्ध समाप्त हो चुका था और मार्च 1946 में, भारतीयों को अंतिम रूप से सत्ता हस्तांतरित करने के बारे में बातचीत और इसकी प्रक्रिया तय करने के लिए कैबिनेट मिशन, को भारत भेजा गया। 5 से 12 मई 1946 के बीच कांग्रेस, मुस्लिम लीग और अंग्रेजी शासकों के बीच वाइसरीगल लॉज में त्रिपक्षीय कान्फ्रैंस हुई और कांग्रेस व मुस्लिम लीग फिर से किसी मुद्दे पर सहमत नहीं हो सके तथा देश का विभाजन तय हो गया।

राष्ट्रपति निवास

स्वतंत्रता के पश्चात सन् 1947 में वाइसरीगल संपदा राष्ट्रपति के हाथों में चली गई। इस भव्य भवन का नया नाम राष्ट्रपति निवास पड़ा भले राष्ट्रपति इसका उपयोग वर्ष भर में चंद दिनों के लिए करते थे।