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Date/Time
Date(s) - 24/09/2025 - 26/09/2025
10:00 am - 6:00 pm

Location
Seminar Hall

Categories


Concept Note
दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी
पूर्वोत्तर की भारतीय ज्ञान परंपरा
तिथि: 24-25 सितंबर, 2025

संगोष्ठी का परिचय एवं उद्देश्य-
पूर्वोत्तर भारत जनजातीय समुदायों का एक समुच्चय है। प्रत्येक जनजातियों की अपनी स्वतंत्र भाषा, मान्यताएं, लोक-विश्वास एवं समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है। पूर्वोत्तर भारत के समाज में ऐसे कई मिथकीय संदर्भ हैं, जिनका सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक महत्त्व है। आज पूर्वोत्तर भारत की अनेक भाषाएँ लुप्त होने के कगार पर हैं और कई पारंपरिक ज्ञान प्रणालियाँ उपेक्षा की शिकार हैं। इसके अलावा इस क्षेत्र के प्रति अकादमिक, सामाजिक और बौद्धिक जगत में अनेक भ्रांतियाँ और जड़ताएँ व्याप्त हैं। इस संगोष्ठी के माध्यम से उत्तर पूर्व की समृद्ध लोक परंपराओं के स्वरूप एवं उसके भारतीय ज्ञान परंपरा से अन्तःसंबंध को जानने का अवसर प्राप्त होगा।
भारतीय ज्ञान परंपरा का लोक और सांस्कृतिक विरासत से गहरा संबंध है। उत्तर पूर्व की लोक-परंपराएँ न केवल सांस्कृतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा को समृद्ध करने में भी इनकी अहम भूमिका रही है। यहाँ के मिथकीय संदर्भ, लोक गीत, लोक कथाएँ, रीति-रिवाज, पारंपरिक ज्ञान और भाषाएँ भारत की सांस्कृतिक विरासत की मूल्यवान घटक हैं। इन परंपराओं में प्रकृति के साथ सामंजस्य, जीवन के प्रति समग्र दृष्टिकोण और समुदाय आधारित जीवन शैली के दर्शन होते हैं। लोक-संस्कृति और अपने पारंपरिक मूल्यों को संरक्षित कर पाने में यह समाज कहाँ तक सफल हो पाया है, इस प्रश्न का अन्वेषण इस संगोष्ठी के माध्यम से करने प्रयास किया जायेगा।
पूर्वोत्तर भारत की लोक विरासत ने भारतीय ज्ञान परंपरा को समृद्ध किया है, इसके तमाम सूत्रों की गवेषणा इस संगोष्ठी के माध्यम से की जायेगी। यह संगोष्ठी भारतीय ज्ञान परंपरा और उत्तर पूर्व की सामजिक-सांस्कृतिक संदर्भों पर केंद्रित है। इसके माध्यम से लोक जीवन की महत्ता, लोक संस्कारों एवं मिथकीय संदर्भों की ऐतिहासिक यात्रा को समझने का अवसर प्राप्त होगा। यह संगोष्ठी संस्कृति संरक्षण के साथ-साथ भाषायी लोक संपदा को सहेजने में मददगार साबित होगी।
पूर्वोत्तर भारत में तकरीबन 200 जनजातियाँ/उप जनजातियाँ निवास करती हैं, इन सभी जनजातियों की स्वतंत्र भाषा, संस्कृति एवं अस्मिता है, इस संगोष्ठी के जरिये से हम उत्तर पूर्व की समृद्ध ज्ञान परंपरा को उद्घाटित कर सकेंगे। इसके माध्यम से उत्तर पूर्व के सामाजिक एवं सांस्कृतिक संदर्भों को जानने का अवसर प्राप्त होगा। संस्कृति एवं भाषा संरक्षण के लिए शोध, दस्तावेजीकरण और नीति-निर्माण की संभावनाओं की दिशा में प्रेरित करना भी इस संगोष्ठी के उद्देश्य में शामिल है। उपरोक्त संदर्भों की दृष्टि से देखें तो यह संगोष्ठी पूर्वोत्तर भारत की लोक परंपराओं और भारतीय ज्ञान परंपरा के मध्य एक वैचारिक सेतु निर्मित करने का प्रयास है।

संगोष्ठी के उप विषय-

  1. पूर्वोत्तर भारत का लोकवृत्त और भारतीय ज्ञान परंपरा
  2. जनजातीय समुदायों की भाषाएँ, लिपियाँ और पारंपरिक ज्ञान प्रणाली
  3. पूर्वोत्तर भारत की मौखिक परंपराएँ और लोक साहित्य
  4. उत्तर पूर्व के जनजातीय समाज और संस्कृति में भारतीय ज्ञान परंपरा के सूत्र
  5. भारतीय ज्ञान परंपरा और उत्तर पूर्व का साहित्य
  6. पूर्वोत्तर की लोक-नाट्य परंपराएँ, पारंपरिक उत्सव और कलाएँ
  7. मिथकीय परंपराओं का भारतीय पुराकथाओं से संवाद
  8. उत्तर पूर्व की सांकृतिक-विरासत और भारतीय ज्ञान मीमांसा
  9. पूर्वोत्तर की भारतीय ज्ञान परंपरा और बौद्ध दर्शन
  10. भारतीय ज्ञान परंपरा के परिप्रेक्ष्य में पूर्वोत्तर के विविध संदर्भ