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Date/Time
Date(s) - 15/10/2025 - 17/10/2025
9:00 am - 6:00 pm

Location
Seminar Hall

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Concept Note
तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी
पंजाब में रचित साहित्य में भारतीय ज्ञान परंपरा का अनुशीलन
(15-17 अक्टूबर 2025)

भाषा की दृष्टि से पंजाब एक समृद्ध भूमि है। यहाँ पंजाबी, संस्कृत, हिंदी, उर्दू, पाली और अंग्रेजी भाषा में साहित्य सृजन की एक सुदीर्घ परंपरा विद्यमान है। विश्व का सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ ‘ऋग्वेद’ पंजाब की भूमि पर रचा गया। पंजाब की भूमि पर ही पाणिनि ने व्याकरण का प्रणयन किया और पंजाब में ही भगवद गीता का प्रणयन भी हुआ। पंजाब भूमि पर ही पाली भाषा का महान ग्रन्थ मिलिंद पन्ह’ रचा गया। पंजाब की भूमि पर श्रीगुरु ग्रन्थ साहिब का प्रणयन भारतीय आध्यात्मिक एवं दार्शनिक चिंतन तथा मध्यकालीन सांस्कृतिक बोध की अभिव्यक्ति है। हिंदी भाषा में प्रथम महाकाव्य और प्रथम उपन्यास सृजन का श्रेय भी पंजाब के रचनाकारों को प्राप्त है। उर्दू और अंग्रेजी भाषा में भी श्रेष्ठ रचनाएं पंजाब के रचनाकारों ने प्रदान की है। पंजाब में रचित इस साहित्य में भारतीय ज्ञान परंपरा का अनुशीलन एक महत्वपूर्ण कार्य है और इसलिए इस विषय पर तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है, जिसका विवरण इसी प्रपत्र में संलग्न है।
भारत की प्राचीन संस्कृति और साहित्य का संवाहक पंजाब प्रदेश देश का सीमावर्ती और महत्वपूर्ण क्षेत्र है। पांच पवित्र नदियों के नाम से पंजाब शब्द प्रयुक्त हुआ जो कभी सप्त सिन्धु प्रदेश रहा है और जिसकी सीमाएं सिंध नदी से लेकर यमुना नदी तक हुआ करती थी। विश्व के सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ ‘ऋग्वेद’ का प्रणयन इसी सप्तसिन्धु अथवा पंचनद की भूमि पर हुआ, वहीं प्रथम व्याकरण का श्रेय भी पंजाब के रहने वाले पाणिनि को ही दिया जाता है। संस्कृत भाषा और साहित्य की यह परंपरा वैदिक, लौकिक, प्राकृत और पाली से होती हुई अपभ्रंश और फिर आधुनिक भारतीय भाषाओं के रूप में विकसित हुई। पंजाब की इस पावन पुण्य भूमि पर संस्कृत, पाली, पंजाबी, हिंदी और उर्दू आदि भाषाओं में विपुल साहित्य सृजन हुआ है। हिंदी भाषा की एक हजार वर्ष की थाती में पंजाब की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। आदिकालीन हिंदी भाषा और साहित्य में नाथों की परंपरा और उनका योगदान अतुलनीय है और पंजाब नाथों की कर्मभूमि रहा है। यही कारण है कि पंजाबी भाषा और हिंदी भाषा में निकटता दिखाई पड़ती है क्योंकि पंजाबी भाषा के आरंभिक विकास में नाथों की महती भूमिका रही है। हिंदी का पहला महाकाव्य ‘पृथ्वीराज रासो’ लिखने का श्रेय चंदबरदायी को प्राप्त है जो मूलतः लाहौर से थे। हिंदी भाषा के पूर्वमध्यकालीन काव्य में गुरु नानक देव जी और परवर्ती गुरुओं की वाणी की भाषा उत्तर भारत की संत परंपरा की भाषा थी, इसका ही सुफ़ल कहा जा सकता है कि श्रीगुरु ग्रन्थ साहिब में सिख गुरुओं के अतिरिक्त हिंदी पट्टी के बहुत से संतों की वाणी को सम्मिलित किया गया है। उत्तर मध्यकालीन काव्य के संवर्धन में गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज की विशेष भूमिका रही है। ब्रिटिश शासन में पंजाब की विविध रियासतों में रचा गया हिंदी साहित्य भी अत्यंत महत्वपूर्ण कहा जा सकता है। आधुनिक हिंदी साहित्य के संवर्धन में पंजाब की भूमिका अत्यंत महत्पूर्ण रही है। श्रद्धाराम फिलौरी का हिंदी साहित्य के संवर्धन में विशेष नाम है। श्रद्धाराम फिलौरी द्वारा रचित ‘ओम जय जगदीश हरे’ की आरती ने पूरे विश्व के हिंदी प्रेमियों को जोड़ने का कार्य किया। हिंदी का पहला उपन्यास लिखने का श्रेय भी ‘भाग्यवती’ के रूप में फिलौरी जी को ही प्राप्त है। आधुनिक हिंदी कथा साहित्य में यशपाल, भीष्म साहनी, उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’, मोहन राकेश, कृष्णा सोबती, मनमोहन सहगल, अजय शर्मा सरीखे नाम राष्ट्रीय स्तर पर पंजाब का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनकी कहानियां और उपन्यास आज हिंदी साहित्य की अमूल्य विरासत है। वहीं काव्य के क्षेत्र में भी पंजाब का योगदान अहम् रहा है। उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ राकेश वत्स, रमेश कुंतल मेघ, हरमहेंद्र सिंह बेदी, राजेन्द्र व्यथित, उदयभानु हंस, बलदेव वंशी, मोहन सपरा, योगेन्द्र बख्शी, विनोद शाही, फूल कुमार मानव, हर्ष कुमार हर्ष, सैली बलजीत जैसे अनेक कवियों ने आधुनिक हिंदी काव्यधारा को अपनी अमूल्य निधियों से मूल्यवान बनाया है। निबंध के क्षेत्र में सरदार पूर्ण सिंह के निबंध आज भी हिंदी जगत को विशेष लालित्य प्रदान करते हैं। नाटक के क्षेत्र में मोहन राकेश अपने आप में एक युग हैं उन्होंने हिंदी नाटक परंपरा का नया आयाम दिया। इनके उपरांत स्वदेश दीपक का नाटक ‘कोर्ट मार्शल’ राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाता है। आज हिंदी की प्रत्येक विधा में पंजाब का लेखक किसी न किसी रूप में लिख रहा है। हिंदी आलोचना जगत में भी रमेश कुंतल ‘मेघ’, शशिभूषण शीतांशु ‘पाण्डेय’, हरमहेंद्र सिंह बेदी, हुकुमचंद राजपाल, विनोद शाही राष्ट्रीय स्तर पर अपनी विशेष पहचान रखते हैं। पंजाब के असंख्य रचनाकार विविध विधाओं में भारतीय ज्ञान परंपरा को प्रवाहित करते हुए हिंदी साहित्य को समृद्ध करने में अपनी भूमिका निभा रहे हैं।
पंजाबी भाषा में साहित्य सृजन बाबा फरीद की वाणी से माना जाता है। पंजाबी भाषा और साहित्य के आरंभिक स्वरूप में नाथों की वैचारिक और भाषागत देन रही है। बाबा फ़रीद के साथ ही पंजाबी में काव्य की परंपरा देखी जा सकती है। श्री गुरु ग्रन्थ साहिब में श्री गुरु नानक देव जी, श्री गुरु अंगद देव जी, श्री गुरु अमरदास जी, श्री गुरु रामदास जी, श्री गुरु अर्जुन देव और श्री गुरु तेग बहादुर जी की वाणी के साथ साथ अनेक संतों की वाणी संकलित है, जो युगों से जनसामान्य का मार्गदर्शन कर रही है। गुरु गोबिंद सिंह जी द्वरा रचित विपुल साहित्य तथा शाह हुसैन, बुल्ले शाह, वारस शाह, पीलू आदि सूफी संतों ने मध्यकाल में भारतीय ज्ञान परंपरा को प्रवाहित किया। आधुनिक पंजाबी काव्य में भाई वीर सिंह, प्रोफ़ेसर पूरण सिंह, संतोख सिंह, दीवान सिंह, प्रीतम सिंह, गुरबख्श सिंह प्रीतलड़ी, नानक सिंह, जसवंत कँवल, गुरदयाल सिंह, संत सिंह सेखों, गुरशरण सिंह, दलीप कौर टिवाणा आदि एक लंबी परंपरा के रूप में पंजाबी साहित्य को देखा जा सकता है, जिसके अंतर्गत भारतीय ज्ञान परंपरा पंजाबी साहित्य की विविध विधाओं के रूप में प्रवाहित हो रही है। पंजाब में संस्कृत भाषा में साहित्य सृजन सर्वाधिक प्राचीन परंपरा रही है। विश्व के सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ ‘ऋग्वेद’ जो संस्कृत भाषा में है, का सृजन पंजाब भूमि में हुआ। पाणिनि ने संस्कृत में व्याकरण की रचना की तथा भारतीय धर्म और दर्शन का आधार ग्रन्थ ‘श्रीमदभगवद गीता’ का प्रणयन भी पंजाब की पुण्य भूमि पर हुआ। पंडित तारा सिंह, पंडित देवराज, भाई परमानंद जी, पंडित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु, पंडित भगवत दत्त, गुरु विरजानंद दंडी, स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती, पंडित श्रद्धाराम फिलौरी, आचार्य विश्वेश्वरानंद सरस्वती, आचार्य विश्वबंधू शास्त्री, विश्वनाथ शास्त्री, पंडित चारुदेव शास्त्री, सत्यव्रत शास्त्री, शिवप्रसाद भारद्वाज, जगदीश प्रसाद सेमवाल, डॉ. श्यामदेव पराशर, डॉ. इन्द्रमोहन सिंह, डॉ. भूषण शर्मा, डॉ. महेशचन्द्र गौतम, आचार्य विद्यानिधि शास्त्री आदि लेखकों ने संस्कृत साहित्य को संवर्धित किया है।
पंजाब में उर्दू साहित्य का इतिहास अत्यंत समृद्ध रहा है। हाफिज़ महमूद शीरानी ने अपनी पुस्तक ‘पंजाब में उर्दू’ (1928) में इस तथ्य का उल्लेख किया है कि उर्दू भाषा का जन्म पंजाब
में हुआ। पंजाब प्रान्त में उर्दू भाषा और साहित्य की एक लंबी परंपरा विद्यमान है। सआदत हसन मंटो, हफीज जालंधरी, साहिर लुधियानवी, अंजुम लुधियानवी, अर्श मलसियानी, बशीर फ़ारूक़, हरी चंद अख्तर, खुशबीर सिंह शाद, राजिंदर सिंह बेदी, कमर जलालाबादी, गोपाल कृष्ण शफ़क आदि एक लंबी सूची उर्दू साहित्यकारों की पंजाब से देखी जा सकती है। इन रचनाकारों ने साहित्य की विविध विधाओं में अपनी लेखनी से उर्दू साहित्य को नवीन मुकाम प्रदान किया। पंजाब में पाली भाषा के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ ‘मिलिंद प्रश्न’ का प्रणयन हुआ। यह ग्रन्थ भारतीय ज्ञान परंपरा का अनूठा उदाहरण है जिसमें भारतीय दर्शन की गहरी छाप दिखाई पड़ती है। औपनिवेशिक शासन के साथ ही पंजाब में अंग्रेजी भाषा और साहित्य का आरंभ हुआ। मुल्कराज आनंद, खुशवंत सिंह, पूरण सिंह, करतार सिंह दुग्गल, संत सिंह सेखो, अमनदीप संधू, अनिरुद्ध काला, रंजित पवार, विजया सिंह आदि लेखकों ने अंग्रेजी भाषा में साहित्य सृजन की धारा को प्रवाहित किया है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि पंजाब के असंख्य रचनाकार हिंदी, पंजाबी, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी आदि विविध भाषाओं और विधाओं के अंतर्गत साहित्य को समृद्ध करते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा के संवाहक के रूप में कार्य कर रहे हैं। प्रस्तुत संगोष्ठी में पंजाब के मूर्धन्य लेखकों के योगदान का विश्लेषण किया जाएगा तथा इनके साहित्य में निहित भारतीय ज्ञान परंपरा का अनुशीलन करने का प्रयास किया जाएगा।
संगोष्ठी के लक्ष्य एवं उद्देश्य
पंजाब में विविध भाषाओं में रचित साहित्य को विषय की दृष्टि से भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ना
निर्गुण धारा के विकास में गुरु ग्रन्थ साहिब की भूमिका
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भारतीय ज्ञान परंपरा औए गुरु ग्रन्थ साहिब के महत्व और आवश्यकता पर दृष्टि केंद्रित करना।
पंजाब में रचित साहित्य में भारतीय ज्ञान परंपरा के तथ्यों का विश्लेषण करना
जनमानस को भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध आयामों से परिचित कराना।
अखिल भारतीय स्वरूप के अंतर्गत गुरु ग्रन्थ साहिब में संकलित वाणीकारों के प्रदेय का निरूपण करना।
भारतीय ज्ञान परंपरा की दृष्टि से मध्यकालीन और आधुनिक पंजाब के साहित्य का अध्ययन एवं विश्लेषण करना
भारतीय ज्ञान परंपरा के निरूपण में पंजाब के लेखकों की भूमिका का विश्लेषण करना
समकालीन परिप्रेक्ष्य में गुरु साहिब के वाणीकारों की महत्ता
संगोष्ठी का महत्त्व और प्रासंगिकता
भारतीय ज्ञान परम्परा और भारत के समृद्ध इतिहास में पंजाब में रचित साहित्य और विशेषकर गुरु ग्रन्थ साहिब का महत्वपूर्ण स्थान है। पंजाब में संस्कृत, हिंदी, पंजाबी, पाली, उर्दू और अंग्रेजी भाषाओं में विपुल साहित्य रचा जा रहा है। विषय और शैली दोनों ही दृष्टियों से यह साहित्य अत्यंत समृद्ध है। यद्यपि स्वतंत्र रूप से इन विषयों पर शोध हो रहा है परन्तु पंजाब के समग्र साहित्य को भारतीय ज्ञान परंपरा की दृष्टि से विश्लेषित करने का यह अभिनव एवं मौलिक प्रयास है।
उपविषयः इस संगोष्ठी के निम्न उप विषय होंगे
1. भारतीय ज्ञान परंपरा का सैद्धांतिक विश्लेषण
2. पंजाब की ऐतिहासिक, दार्शनिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि
3. प्राचीन पंजाब का संस्कृत साहित्य और भारतीय ज्ञान परंपरा
4. श्रीगुरु ग्रन्थ साहिब और भारतीय ज्ञान परंपरा
5. पंजाब में रचित रीतिकालीन दरबारी हिंदी साहित्य में भारतीय ज्ञान परंपरा
6. पंजाब में रचित मध्यकालीन पंजाबी साहित्य में भारतीय ज्ञान परंपरा
7. पंजाब में रचित मध्यकालीन उर्दू साहित्य में भारतीय ज्ञान परंपरा
8. पंजाब में रचित मिलिंद प्रश्न में भारतीय ज्ञान परंपरा
9. पंजाब में रचित आधुनिक संस्कृत साहित्य में भारतीय ज्ञान परंपरा
10. पंजाब में रचित आधुनिक हिंदी साहित्य में भारतीय ज्ञान परंपरा
11. पंजाब में रचित आधुनिक पंजाबी साहित्य में भारतीय ज्ञान परंपरा
13. पंजाब में रचित आधुनिक उर्दू साहित्य में भारतीय ज्ञान परंपरा
14. पंजाब में रचित अंग्रेजी साहित्य में भारतीय ज्ञान परंपरा
15. विषय से संबंधित अन्य उपविषय